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2 मार्च होलिका दहन
होलिका दहन 2026 को लेकर संशय खत्म, 2 मार्च प्रदोष काल में शुभ
होलिका दहन 2026 की सही तिथि स्पष्ट, 2 मार्च प्रदोष काल में करें पूजन
19 Feb 2026, 05:34 PM
Uttar Pradesh -
Varanasi
Reporter :
Mahesh Sharma
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Varanasi होलिका दहन 2026 की तिथि को लेकर श्रद्धालुओं के बीच संशय की स्थिति बनी हुई थी कि यह अनुष्ठान 2 मार्च को किया जाए या 3 मार्च को। ज्योतिषाचार्यों और पंचांग विशेषज्ञों के अनुसार इस वर्ष होलिका दहन 2 मार्च की शाम प्रदोष काल में करना अधिक शुभ माना जा रहा है।
हिंदू धर्म ग्रंथों और पंचांगों के अनुसार होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि में, विशेष रूप से प्रदोष काल में किया जाता है। साथ ही यह भी स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि यह अनुष्ठान भद्रा काल में नहीं करना चाहिए। धर्मशास्त्रों में वर्णित नियमों के अनुसार यदि भद्रा मुख का समय हो तो उससे बचना चाहिए।
पंडितों का कहना है कि 2 मार्च को प्रदोष काल में भद्रा का प्रभाव नहीं रहेगा, इसलिए यह समय होलिका दहन के लिए उपयुक्त है। 3 मार्च को प्रतिपदा तिथि आरंभ हो जाएगी, जो रंगोत्सव यानी होली खेलने का दिन माना जाता है। इस कारण 2 मार्च की संध्या को होलिका दहन करना शास्त्रसम्मत रहेगा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। यह पर्व भक्त प्रह्लाद की अटूट श्रद्धा और असत्य पर सत्य की जीत का संदेश देता है। इसी परंपरा के तहत लोग लकड़ियां, उपले और पूजन सामग्री एकत्र कर विधि-विधान से अग्नि प्रज्वलित करते हैं।
इस वर्ष एक अन्य चर्चा चंद्र ग्रहण को लेकर भी रही। हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार यह ग्रहण भारत के केवल पूर्वोत्तर हिस्सों में आंशिक रूप से दिखाई देगा। चूंकि अधिकांश स्थानों पर ग्रहण का दृश्य प्रभाव नहीं रहेगा, इसलिए सूतक काल पूरे देश में मान्य नहीं होगा। अतः होलिका दहन के अनुष्ठान पर इसका कोई व्यापक प्रभाव नहीं पड़ेगा।
धर्माचार्यों ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे स्थानीय पंचांग और विद्वान पंडितों से परामर्श लेकर ही अंतिम निर्णय लें, क्योंकि अलग-अलग क्षेत्रों में मुहूर्त में मामूली अंतर संभव है।
होलिका दहन के अगले दिन 3 मार्च को रंगों का त्योहार होली पूरे उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाएगा। इस दिन लोग एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाकर आपसी प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हैं।
इस प्रकार पंचांग गणना और शास्त्रीय मत के आधार पर 2026 में होलिका दहन 2 मार्च की संध्या को करना सर्वाधिक शुभ और मान्य माना जा रहा है।
हिंदू धर्म ग्रंथों और पंचांगों के अनुसार होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि में, विशेष रूप से प्रदोष काल में किया जाता है। साथ ही यह भी स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि यह अनुष्ठान भद्रा काल में नहीं करना चाहिए। धर्मशास्त्रों में वर्णित नियमों के अनुसार यदि भद्रा मुख का समय हो तो उससे बचना चाहिए।
पंडितों का कहना है कि 2 मार्च को प्रदोष काल में भद्रा का प्रभाव नहीं रहेगा, इसलिए यह समय होलिका दहन के लिए उपयुक्त है। 3 मार्च को प्रतिपदा तिथि आरंभ हो जाएगी, जो रंगोत्सव यानी होली खेलने का दिन माना जाता है। इस कारण 2 मार्च की संध्या को होलिका दहन करना शास्त्रसम्मत रहेगा।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। यह पर्व भक्त प्रह्लाद की अटूट श्रद्धा और असत्य पर सत्य की जीत का संदेश देता है। इसी परंपरा के तहत लोग लकड़ियां, उपले और पूजन सामग्री एकत्र कर विधि-विधान से अग्नि प्रज्वलित करते हैं।
इस वर्ष एक अन्य चर्चा चंद्र ग्रहण को लेकर भी रही। हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार यह ग्रहण भारत के केवल पूर्वोत्तर हिस्सों में आंशिक रूप से दिखाई देगा। चूंकि अधिकांश स्थानों पर ग्रहण का दृश्य प्रभाव नहीं रहेगा, इसलिए सूतक काल पूरे देश में मान्य नहीं होगा। अतः होलिका दहन के अनुष्ठान पर इसका कोई व्यापक प्रभाव नहीं पड़ेगा।
धर्माचार्यों ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे स्थानीय पंचांग और विद्वान पंडितों से परामर्श लेकर ही अंतिम निर्णय लें, क्योंकि अलग-अलग क्षेत्रों में मुहूर्त में मामूली अंतर संभव है।
होलिका दहन के अगले दिन 3 मार्च को रंगों का त्योहार होली पूरे उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाएगा। इस दिन लोग एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाकर आपसी प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हैं।
इस प्रकार पंचांग गणना और शास्त्रीय मत के आधार पर 2026 में होलिका दहन 2 मार्च की संध्या को करना सर्वाधिक शुभ और मान्य माना जा रहा है।