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कॉलेज में बंदरों के आतंक से राहत दिलाई
अलीगढ़ के धर्म समाज महाविद्यालय में लंबे समय से बंदरों का आतंक छात्रों और स्टाफ के लिए बड़ी परेशानी बना हुआ था। आए दिन बंदर कैंपस में घुसकर छात्रों से खाना छीन लेते, उन पर हमला कर देते और माहौल को असुरक्षित बना देते थे। कई बार तो छात्र-छात्राओं को चोट भी लग जाती थी, जिससे कॉलेज प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई थी। इसी समस्या का समाधान निकालने के लिए एक अनोखा तरीका अपनाया गया, जिसमें एक प्रशिक्षित लंगूर को कैंपस में तैनात किया गया। इस लंगूर का नाम ‘गोलू’ रखा गया और उसकी मौजूदगी से बंदरों का आतंक काफी हद तक कम हो गया। गोलू की सक्रियता और फुर्ती ने जल्द ही उसे कॉलेज का हीरो बना दिया।
‘गोलू’ बना छात्रों का प्यारा साथी
गोलू सिर्फ एक ‘सिक्योरिटी गार्ड’ नहीं था, बल्कि वह धीरे-धीरे छात्रों के दिलों का हिस्सा बन गया। छात्र उसके साथ समय बिताते, फोटो खिंचवाते और उसे परिवार के सदस्य की तरह मानने लगे थे। उसकी मासूम हरकतें और शांत स्वभाव उसे सबसे अलग बनाते थे। कॉलेज में आने वाले नए छात्रों के लिए भी गोलू एक आकर्षण का केंद्र बन गया था। कई छात्र तो उसे देखकर अपने दिन की शुरुआत करते थे। गोलू की वजह से कैंपस का माहौल भी हल्का-फुल्का और सकारात्मक बना रहता था।
12 हजार सैलरी पर निभाई जिम्मेदारी
गोलू को कॉलेज में एक खास जिम्मेदारी के तहत रखा गया था, जिसके लिए उसे लगभग 12 हजार रुपये मासिक भुगतान किया जाता था। यह व्यवस्था इसलिए की गई थी ताकि बंदरों के आतंक से स्थायी राहत मिल सके। गोलू के प्रशिक्षक उसकी देखभाल करते थे और यह सुनिश्चित करते थे कि वह स्वस्थ और सक्रिय बना रहे। यह अनोखी पहल न सिर्फ सफल रही, बल्कि अन्य संस्थानों के लिए भी एक उदाहरण बन गई। गोलू ने अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाया और कॉलेज परिसर को सुरक्षित बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई।
वन विभाग ने लिया बड़ा फैसला, दी आजादी
हालांकि, वन विभाग का मानना है कि किसी भी वन्यजीव को लंबे समय तक कृत्रिम वातावरण में रखना सही नहीं है। इसी कारण विभाग ने गोलू को उसके प्राकृतिक आवास में वापस छोड़ने का निर्णय लिया। अधिकारियों के अनुसार, जंगली जानवरों के लिए खुला वातावरण ही सबसे उपयुक्त होता है, जहां वे अपने स्वाभाविक व्यवहार के साथ जीवन जी सकें। इस फैसले के तहत गोलू को सुरक्षित तरीके से जंगल में छोड़ दिया गया, ताकि वह स्वतंत्र जीवन जी सके।
विदाई के समय भावुक हुए छात्र और स्टाफ
गोलू की विदाई का दिन कॉलेज के लिए बेहद भावुक रहा। छात्र और स्टाफ, जिन्होंने दो साल तक गोलू को अपने बीच देखा था, उसे जाते हुए देखकर भावुक हो गए। कई छात्रों ने उसके साथ बिताए पलों को याद किया और कहा कि गोलू सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि उनका दोस्त था। विदाई के समय माहौल में एक अजीब सी खामोशी और उदासी छा गई थी। यह पल दिखाता है कि इंसान और जानवर के बीच भी गहरा भावनात्मक रिश्ता बन सकता है।
मानव और वन्यजीव के रिश्ते की अनोखी मिसाल
गोलू की कहानी सिर्फ एक लंगूर की नहीं, बल्कि इंसान और वन्यजीव के बीच बने एक अनोखे रिश्ते की मिसाल है। यह घटना यह भी सिखाती है कि समस्याओं का समाधान कभी-कभी अनोखे तरीकों से भी निकाला जा सकता है। हालांकि, साथ ही यह भी जरूरी है कि वन्यजीवों को उनके प्राकृतिक वातावरण में ही रहने दिया जाए। गोलू की विदाई ने यह संदेश दिया कि आजादी हर जीव का अधिकार है और हमें प्रकृति के नियमों का सम्मान करना चाहिए।
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