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मौसम विज्ञान में AI
AI से मौसम भविष्यवाणी में सटीकता बढ़ेगी
AI और पारंपरिक मॉडल मिलकर बदलेंगे मौसम पूर्वानुमान, डॉ. रविचंद्रन ने पेश किया रोडमैप
21 Feb 2026, 10:50 AM
Delhi -
New Delhi
Reporter :
Mahesh Sharma
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New Delhi मौसम पूर्वानुमान के क्षेत्र में जल्द ही बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। Ministry of Earth Sciences के सचिव M. Ravichandran ने कहा है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और पारंपरिक भौतिकी आधारित मॉडलों के संयोजन से मौसम की भविष्यवाणी पहले से अधिक सटीक और प्रभावी बन सकती है। उन्होंने यह बात नई दिल्ली में आयोजित AI Impact Summit 2026 के दौरान कही।
समिट में ‘जलवायु एक्सट्रीम को संभालने और टिकाऊ सिस्टम विकसित करने में AI की भूमिका’ विषय पर आयोजित पैनल चर्चा में डॉ. रविचंद्रन ने विस्तार से रोडमैप पेश किया। उनका कहना था कि पारंपरिक भौतिकी मॉडल बड़े स्तर पर मौसम के पैटर्न को समझने में सक्षम हैं, लेकिन सूक्ष्म स्तर पर तेजी से बदलती परिस्थितियों को पकड़ने में AI ज्यादा प्रभावी साबित हो सकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि भविष्य की मौसम प्रणाली में हाइब्रिड मॉडल की आवश्यकता होगी, जहां भौतिकी आधारित गणनाओं के साथ मशीन लर्निंग और डेटा एनालिटिक्स का उपयोग किया जाएगा। इससे चक्रवात, बाढ़, हीटवेव और अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाओं की समय रहते सटीक भविष्यवाणी संभव हो सकेगी।
डॉ. रविचंद्रन ने यह भी कहा कि केवल एक विभाग या एक वैज्ञानिक पद्धति के भरोसे अब आगे नहीं बढ़ा जा सकता। उन्होंने जीव विज्ञान, डेटा साइंस, कंप्यूटर इंजीनियरिंग और पर्यावरण अध्ययन जैसे विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के साथ सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार, जलवायु परिवर्तन जैसी जटिल चुनौती का समाधान बहु-विषयक दृष्टिकोण से ही संभव है।
विशेषज्ञों का मानना है कि AI आधारित मॉडल बड़ी मात्रा में उपग्रह डेटा, समुद्री तापमान, वायुमंडलीय दबाव और ऐतिहासिक मौसम पैटर्न का विश्लेषण कर तेजी से निष्कर्ष निकाल सकते हैं। इससे आपदा प्रबंधन एजेंसियों को समय पर चेतावनी जारी करने में मदद मिलेगी और जन-धन की हानि कम की जा सकेगी।
समिट में शामिल वैज्ञानिकों ने यह भी सुझाव दिया कि भारत जैसे विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाले देश में क्षेत्रीय स्तर पर AI मॉडल विकसित किए जाने चाहिए। इससे स्थानीय मौसम पैटर्न की बेहतर समझ विकसित होगी और किसानों, मछुआरों तथा शहरी प्रशासन को सटीक जानकारी मिल सकेगी।
कुल मिलाकर, AI और पारंपरिक मौसम विज्ञान के मेल से एक नई क्रांति की संभावना दिखाई दे रही है। यदि प्रस्तावित रोडमैप पर प्रभावी ढंग से अमल किया गया, तो आने वाले वर्षों में मौसम पूर्वानुमान प्रणाली अधिक विश्वसनीय, तेज और जनहितकारी बन सकती है।
समिट में ‘जलवायु एक्सट्रीम को संभालने और टिकाऊ सिस्टम विकसित करने में AI की भूमिका’ विषय पर आयोजित पैनल चर्चा में डॉ. रविचंद्रन ने विस्तार से रोडमैप पेश किया। उनका कहना था कि पारंपरिक भौतिकी मॉडल बड़े स्तर पर मौसम के पैटर्न को समझने में सक्षम हैं, लेकिन सूक्ष्म स्तर पर तेजी से बदलती परिस्थितियों को पकड़ने में AI ज्यादा प्रभावी साबित हो सकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि भविष्य की मौसम प्रणाली में हाइब्रिड मॉडल की आवश्यकता होगी, जहां भौतिकी आधारित गणनाओं के साथ मशीन लर्निंग और डेटा एनालिटिक्स का उपयोग किया जाएगा। इससे चक्रवात, बाढ़, हीटवेव और अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाओं की समय रहते सटीक भविष्यवाणी संभव हो सकेगी।
डॉ. रविचंद्रन ने यह भी कहा कि केवल एक विभाग या एक वैज्ञानिक पद्धति के भरोसे अब आगे नहीं बढ़ा जा सकता। उन्होंने जीव विज्ञान, डेटा साइंस, कंप्यूटर इंजीनियरिंग और पर्यावरण अध्ययन जैसे विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के साथ सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार, जलवायु परिवर्तन जैसी जटिल चुनौती का समाधान बहु-विषयक दृष्टिकोण से ही संभव है।
विशेषज्ञों का मानना है कि AI आधारित मॉडल बड़ी मात्रा में उपग्रह डेटा, समुद्री तापमान, वायुमंडलीय दबाव और ऐतिहासिक मौसम पैटर्न का विश्लेषण कर तेजी से निष्कर्ष निकाल सकते हैं। इससे आपदा प्रबंधन एजेंसियों को समय पर चेतावनी जारी करने में मदद मिलेगी और जन-धन की हानि कम की जा सकेगी।
समिट में शामिल वैज्ञानिकों ने यह भी सुझाव दिया कि भारत जैसे विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाले देश में क्षेत्रीय स्तर पर AI मॉडल विकसित किए जाने चाहिए। इससे स्थानीय मौसम पैटर्न की बेहतर समझ विकसित होगी और किसानों, मछुआरों तथा शहरी प्रशासन को सटीक जानकारी मिल सकेगी।
कुल मिलाकर, AI और पारंपरिक मौसम विज्ञान के मेल से एक नई क्रांति की संभावना दिखाई दे रही है। यदि प्रस्तावित रोडमैप पर प्रभावी ढंग से अमल किया गया, तो आने वाले वर्षों में मौसम पूर्वानुमान प्रणाली अधिक विश्वसनीय, तेज और जनहितकारी बन सकती है।