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इस्लामाबाद में 21 घंटे का कूटनीतिक दौरा
अमेरिका के उपराष्ट्रपति JD Vance ने पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में करीब 21 घंटे का बेहद अहम और व्यस्त दौरा किया, जिसमें उनका मुख्य उद्देश्य Iran के साथ चल रहे तनाव को कम करना और शांति वार्ता को आगे बढ़ाना था। इस दौरान उन्होंने कई उच्च स्तरीय बैठकों में हिस्सा लिया, जिनमें अमेरिकी और क्षेत्रीय अधिकारियों के साथ-साथ पाकिस्तान के शीर्ष नेतृत्व के साथ भी गहन चर्चा हुई। सूत्रों के मुताबिक, इन बैठकों का माहौल शुरू से ही गंभीर और दबावपूर्ण रहा, क्योंकि दोनों पक्षों के बीच कई अहम मुद्दों पर सहमति बनाना आसान नहीं था।
16 घंटे तक चली बंद कमरे की बैठकों का दौर
इस पूरे दौरे की सबसे खास बात यह रही कि लगभग 16 घंटे तक लगातार बंद कमरों में बातचीत का सिलसिला चलता रहा। इन बैठकों में परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा और प्रतिबंधों जैसे संवेदनशील मुद्दों पर गहन चर्चा हुई। अधिकारियों के अनुसार, बातचीत कई बार सकारात्मक दिशा में बढ़ती दिखी, लेकिन कुछ प्रमुख बिंदुओं पर अड़चनें बार-बार सामने आती रहीं। यही वजह रही कि इतने लंबे समय तक बातचीत के बावजूद कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आ सका।
व्हाइट हाउस की सीधी निगरानी में बातचीत
पूरी वार्ता प्रक्रिया के दौरान White House की सीधी नजर बनी रही। वेंस लगातार वॉशिंगटन से संपर्क में थे और हर महत्वपूर्ण फैसले से पहले उच्च स्तर पर सलाह-मशविरा किया जा रहा था। इससे यह साफ होता है कि यह वार्ता केवल क्षेत्रीय स्तर की नहीं, बल्कि वैश्विक कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा थी। अमेरिका इस बातचीत को लेकर काफी गंभीर था और चाहता था कि किसी भी तरह से ईरान के साथ तनाव कम किया जा सके।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में वेंस ने जताई निराशा
बैठकों के समाप्त होने के बाद जब वेंस प्रेस के सामने आए, तो उनके चेहरे पर थकान और निराशा साफ नजर आई। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह वार्ता ‘बुरी खबर’ के साथ खत्म हुई है। वेंस ने इस असफलता के लिए ईरान के रुख को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि कई अहम मुद्दों पर लचीलापन नहीं दिखाया गया। उनके इस बयान से साफ संकेत मिला कि आने वाले समय में दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ सकता है।
ईरान-अमेरिका मतभेद बने बड़ी रुकावट
अमेरिका और Iran के बीच लंबे समय से चले आ रहे मतभेद इस वार्ता में भी बड़ी बाधा बने। खासकर परमाणु कार्यक्रम और आर्थिक प्रतिबंधों को लेकर दोनों देशों के रुख में बड़ा अंतर देखने को मिला। जहां अमेरिका सख्त नियंत्रण और पारदर्शिता चाहता है, वहीं ईरान अपनी संप्रभुता और अधिकारों को लेकर समझौता करने को तैयार नहीं दिखा। यही टकराव इस वार्ता की विफलता का मुख्य कारण बना।
भविष्य की रणनीति पर टिकी वैश्विक नजरें
इस असफल वार्ता के बाद अब पूरी दुनिया की नजरें अमेरिका की अगली रणनीति पर टिकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में कूटनीतिक दबाव, आर्थिक प्रतिबंध या अन्य उपायों के जरिए ईरान पर दबाव बढ़ाया जा सकता है। वहीं पाकिस्तान की भूमिका भी इस पूरे घटनाक्रम में अहम मानी जा रही है, क्योंकि उसने इस वार्ता के लिए मंच उपलब्ध कराया। कुल मिलाकर, यह 21 घंटे का दौरा भले ही बेनतीजा रहा हो, लेकिन इसके दूरगामी प्रभाव वैश्विक राजनीति पर जरूर देखने को मिलेंगे।
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