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बजट सत्र को लेकर संसद में बढ़ा टकराव
संसद के बजट सत्र को आगे बढ़ाने के मुद्दे पर सियासी माहौल अचानक गर्म हो गया है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इस विषय को लेकर तीखी बहस देखने को मिली। राज्यसभा में इस मुद्दे पर चर्चा के दौरान सरकार की ओर से स्पष्ट संकेत दिया गया कि सत्र की अवधि बढ़ाने का निर्णय पूरी तरह सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। वहीं विपक्ष ने इस रुख पर कड़ी आपत्ति जताई और इसे लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ बताया। पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि संसद के अंदर सहमति बनाने के बजाय टकराव की स्थिति बनती जा रही है, जिससे आगे की कार्यवाही भी प्रभावित हो सकती है।
J. P. Nadda ने सरकार के अधिकार पर दिया जोर
सत्ता पक्ष की ओर से बोलते हुए जे.पी. नड्डा ने साफ कहा कि बजट सत्र को बढ़ाने या समाप्त करने का निर्णय सरकार ही लेगी और यह निर्णय पूरी प्रक्रिया के तहत लिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार संसद की कार्यवाही को व्यवस्थित तरीके से चलाने के लिए प्रतिबद्ध है और किसी भी निर्णय को जल्दबाजी में नहीं लिया जाएगा। नड्डा के इस बयान को सरकार के स्पष्ट रुख के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें कार्यपालिका की भूमिका को प्रमुखता दी गई है।
Mallikarjun Kharge का पलटवार, लोकतंत्र की बात उठाई
विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने नड्डा के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि संसद में इस तरह का रवैया स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार बिना सर्वदलीय सहमति के फैसले थोपने की कोशिश कर रही है। खड़गे ने कहा कि लोकतंत्र में सभी दलों की राय लेना जरूरी होता है और एकतरफा निर्णय लेने से संसद की गरिमा को ठेस पहुंचती है। उनका यह बयान विपक्ष की बढ़ती नाराजगी को दर्शाता है।
सर्वदलीय बैठक की मांग, बढ़ा राजनीतिक दबाव
विपक्ष ने इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है, ताकि सभी दल मिलकर सत्र के भविष्य पर निर्णय ले सकें। खड़गे ने कहा कि उन्होंने पहले भी इस संबंध में पत्र लिखा था, लेकिन उस पर कोई ठोस पहल नहीं की गई। इस मांग ने सरकार पर अतिरिक्त दबाव बना दिया है, क्योंकि विपक्ष अब इसे एक बड़े मुद्दे के रूप में उठा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर इस पर सहमति नहीं बनी, तो संसद की कार्यवाही में और बाधाएं आ सकती हैं।
महिला आरक्षण और अन्य विधेयकों पर भी चर्चा
इस बहस के दौरान महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों का मुद्दा भी उठाया गया। सरकार की ओर से कहा गया कि इस तरह के अहम मुद्दों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए और सभी दलों को मिलकर देशहित में काम करना चाहिए। हालांकि विपक्ष का मानना है कि सरकार इन मुद्दों को सही तरीके से आगे नहीं बढ़ा रही है। इस बहस ने यह भी दिखाया कि संसद में केवल सत्र की अवधि ही नहीं, बल्कि कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर भी मतभेद बने हुए हैं।
सत्र के भविष्य पर अनिश्चितता, आगे की राह कठिन
बजट सत्र को लेकर जारी इस विवाद ने आगे की कार्यवाही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ सरकार अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने की बात कर रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष सहमति और संवाद की मांग पर अड़ा हुआ है। इस टकराव के बीच यह साफ नहीं है कि सत्र आगे कैसे चलेगा और किन मुद्दों पर सहमति बन पाएगी। फिलहाल यह मामला सियासी बयानबाजी से आगे बढ़कर संसद की कार्यप्रणाली पर असर डालता दिख रहा है, जिससे आने वाले दिनों में और भी तनाव देखने को मिल सकता है।
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