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ब्राह्मण उम्मीदवारों की घटती सियासी भूमिका
तमिलनाडु की राजनीतिक परिदृश्य में इस बार ब्राह्मण उम्मीदवारों की भूमिका काफी हद तक कम हो गई है। डीएमके, कांग्रेस, AIADMK और बीजेपी जैसे बड़े दलों ने 234 विधानसभा सीटों में किसी भी ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया। पिछले दशकों में ब्राह्मण समाज ने राज्य की सियासत में अपनी छाप छोड़ी थी, लेकिन द्रविड़ आंदोलन और सामाजिक न्याय की राजनीति के चलते अब उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी हाशिए पर पहुंच गई है। राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि यह बदलाव तमिलनाडु की सामाजिक संरचना और जातीय समीकरणों का नतीजा है।
दल क्यों दे रहे हैं ब्राह्मणों से किनारा
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार तमिलनाडु की कुल जनसंख्या में ब्राह्मणों का हिस्सा केवल 3 प्रतिशत है। इसलिए बड़े दल चुनावी रणनीति में जातीय और सामाजिक समीकरणों पर ध्यान देते हुए ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता दे रहे हैं जिनकी वोट बैंक में ताकत ज्यादा है। AIADMK और बीजेपी ने भी इस बार ब्राह्मण उम्मीदवारों को नजरअंदाज किया क्योंकि उन्हें लगा कि चुनावी सफलता के लिए अन्य जातियों और समुदायों के उम्मीदवारों का चुनाव ज्यादा प्रभावी रहेगा।
डीएमके और कांग्रेस की रणनीति
डीएमके और कांग्रेस गठबंधन ने कुल 164 और 28 सीटों पर चुनाव लड़ा है, लेकिन दोनों दलों ने ब्राह्मणों को टिकट नहीं दिया। इसका कारण यह बताया गया कि राजनीतिक जीत के लिए दलों को ऐसे उम्मीदवार चुनने की आवश्यकता थी जिनका समर्थन समुदायों और समाज के बड़े वर्ग से हो। इस बार का चुनाव तमिलनाडु की सामाजिक न्याय राजनीति का परीक्षण भी है, जिसमें ब्राह्मणों की भूमिका नगण्य नजर आ रही है।
एनडीए गठबंधन की स्थिति
एनडीए गठबंधन में शामिल AIADMK ने 178 और बीजेपी ने 27 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन ब्राह्मण उम्मीदवारों का दांव इस बार पूरी तरह से नहीं खेला। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि दलों ने जातीय समीकरण के आधार पर यह निर्णय लिया। पीएमके ने भी 18 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए, लेकिन कोई ब्राह्मण उम्मीदवार नहीं था। यह रणनीति चुनावी जीत को प्राथमिकता देने वाली है, न कि समाज में ब्राह्मणों की राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ाने वाली।
सामाजिक न्याय का प्रभाव
तमिलनाडु को सामाजिक न्याय की प्रयोगशाला माना जाता है। पिछले दशकों में द्रविड़ आंदोलन ने जातीय समीकरण और सामाजिक न्याय को मजबूत किया। इस वजह से ब्राह्मण उम्मीदवारों को कम महत्व दिया जा रहा है। राजनीतिक दलों के लिए यह चुनौती भी है कि कैसे छोटे समुदायों के वोट बैंक और सामाजिक समीकरणों का संतुलन बनाए रखें। चुनावी रणनीति में सामाजिक न्याय का असर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।
भविष्य में ब्राह्मण राजनीति की राह
विशेषज्ञों का कहना है कि तमिलनाडु में ब्राह्मण राजनीति फिलहाल हाशिए पर है, लेकिन यह पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों के बदलाव के साथ भविष्य में ब्राह्मण उम्मीदवारों को फिर से प्रमुखता मिल सकती है। इस बार के चुनाव ने साफ कर दिया है कि तमिलनाडु में जातीय समीकरण और सामाजिक न्याय राजनीति की ताकत सबसे अधिक है, और यही अगले चुनावों में दलों की रणनीति तय करेगी।
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