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प्रश्नकाल में मंत्री की अनुपस्थिति से विवाद
लोकसभा की कार्यवाही के दौरान उस समय असहज स्थिति बन गई जब प्रश्नकाल में संबंधित मंत्री सदन में मौजूद नहीं पाए गए। यह मामला उस समय सामने आया जब सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय से जुड़े सवाल सूचीबद्ध थे और उनके जवाब के लिए मंत्री को बुलाया गया। लेकिन जब नाम पुकारा गया, तो न तो मंत्री मौजूद थे और न ही उनकी ओर से कोई प्रतिनिधि तुरंत जवाब देने के लिए खड़ा हुआ। इससे सदन की कार्यवाही कुछ देर के लिए प्रभावित हुई और विपक्ष सहित कई सदस्यों ने इस पर नाराजगी जताई।
स्पीकर ओम बिरला ने जताई सख्त नाराजगी
इस स्थिति पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने बार-बार मंत्री का नाम पुकारा और कुछ समय तक इंतजार भी किया, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रश्नकाल संसद की कार्यवाही का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है और इसमें मंत्रियों की उपस्थिति अनिवार्य है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस तरह की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी और जिम्मेदार लोगों को जवाब देना होगा।
मंत्री और राज्यमंत्री दोनों रहे नदारद
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी बात यह रही कि संबंधित मंत्रालय के कैबिनेट मंत्री जीतनराम मांझी ही नहीं, बल्कि राज्यमंत्री भी उस समय सदन में मौजूद नहीं थे। इससे स्थिति और गंभीर हो गई, क्योंकि आमतौर पर किसी एक के अनुपस्थित होने पर दूसरा प्रतिनिधित्व करता है। दोनों की गैरमौजूदगी ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या मंत्रालय स्तर पर समन्वय की कमी है या फिर संसद की कार्यवाही को लेकर पर्याप्त गंभीरता नहीं दिखाई जा रही।
संसदीय परंपराओं पर उठे सवाल
इस घटना के बाद संसद की कार्यप्रणाली और परंपराओं को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। प्रश्नकाल को लोकतंत्र की जवाबदेही का सबसे अहम मंच माना जाता है, जहां जनप्रतिनिधि सरकार से सीधे सवाल पूछते हैं और जवाब प्राप्त करते हैं। ऐसे में यदि संबंधित मंत्री ही उपस्थित न हों, तो यह प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक व्यक्ति की अनुपस्थिति का मामला नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जिम्मेदारी का मुद्दा है।
विपक्ष ने भी उठाए गंभीर मुद्दे
इस घटना के बाद विपक्षी दलों ने भी सरकार पर निशाना साधा और कहा कि यह सरकार की कार्यशैली को दर्शाता है। उनका कहना है कि जब मंत्री खुद ही सदन में उपस्थित नहीं होंगे, तो जनता के सवालों का जवाब कौन देगा। विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के प्रति लापरवाही करार दिया और मांग की कि इस मामले में स्पष्ट जवाब दिया जाए और भविष्य में ऐसी स्थिति न बने इसके लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
जवाबदेही तय करने की जरूरत पर जोर
घटना के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि संसद की गरिमा बनाए रखने के लिए सभी पक्षों को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। विशेष रूप से मंत्रियों की उपस्थिति और उनकी जवाबदेही सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। इस तरह की घटनाएं न केवल सदन की कार्यवाही को प्रभावित करती हैं, बल्कि जनता के विश्वास को भी कमजोर कर सकती हैं। ऐसे में आवश्यक है कि इस मामले से सबक लेते हुए आगे के लिए सख्त दिशा-निर्देश तय किए जाएं, ताकि लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख बरकरार रहे।
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