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83 वर्षीय अफसर ठगी शिकार
साइबर ठगों ने डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाया
डिजिटल अरेस्ट के जाल में फंसे रिटायर्ड नेवी अफसर, साइबर ठगों ने ठगे 42 लाख रुपये
21 Feb 2026, 11:34 AM
Gujarat -
Ahmedabad
Reporter :
Mahesh Sharma
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Ahmedabad अहमदाबाद के सैटेलाइट इलाके में रहने वाले 83 वर्षीय सेवानिवृत्त नौसेना अधिकारी साइबर ठगी का शिकार हो गए। ठगों ने उन्हें ‘डिजिटल अरेस्ट’ का भय दिखाकर 42.50 लाख रुपये ऐंठ लिए। यह मामला एक बार फिर दर्शाता है कि किस तरह संगठित साइबर गिरोह वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बना रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, पीड़ित अधिकारी को पहले एक फोन कॉल आया, जिसमें खुद को जांच एजेंसी का अधिकारी बताया गया। कॉलर ने दावा किया कि उनके नाम पर मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा मामला दर्ज है और तुरंत जांच में सहयोग नहीं करने पर गिरफ्तारी हो सकती है। इसके बाद उन्हें लगातार 48 घंटे तक फोन और वीडियो कॉल के जरिए ‘निगरानी’ में रखा गया।
ठगों ने वीडियो कॉल पर एक फर्जी कोर्ट रूम जैसा दृश्य दिखाया, जहां जज की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति और अन्य कथित अधिकारी नजर आ रहे थे। इससे बुजुर्ग अधिकारी घबरा गए और उन्हें यकीन हो गया कि मामला गंभीर है। ठगों ने कहा कि जांच पूरी होने तक उन्हें किसी से संपर्क नहीं करना है और बैंक खाते की जानकारी साझा करनी होगी।
डर और दबाव में आकर अधिकारी ने अपनी पत्नी को बैंक भेजा, जहां एफडी तुड़वाकर रकम ट्रांसफर की गई। कुल मिलाकर 42.50 लाख रुपये अलग-अलग खातों में भेज दिए गए। हालांकि बैंक कर्मचारियों को लेन-देन संदिग्ध लगा और उन्होंने सतर्कता बरतते हुए आगे की बड़ी राशि ट्रांसफर होने से रोक दी।
इस मामले में अधिकारी के 53 वर्षीय बेटे ने अहमदाबाद साइबर क्राइम ब्रांच में शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि कॉल अंतरराज्यीय गिरोह द्वारा की गई थी और रकम कई खातों में घुमाई गई।
साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे नए तरीके से ठग लोगों को मानसिक दबाव में डालते हैं। वे सरकारी एजेंसियों जैसे सीबीआई या पुलिस का नाम लेकर डर पैदा करते हैं और तुरंत कार्रवाई का भय दिखाते हैं।
पुलिस ने नागरिकों से अपील की है कि किसी भी अनजान कॉल पर बैंक विवरण साझा न करें और जांच एजेंसियों के नाम पर धमकी मिलने पर तुरंत स्थानीय पुलिस या साइबर हेल्पलाइन 1930 पर संपर्क करें।
यह घटना बताती है कि तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के साथ सतर्कता भी उतनी ही जरूरी है। खासकर वरिष्ठ नागरिकों को जागरूक करना समय की मांग बन गया है, ताकि वे ऐसे जालसाजों के चंगुल में न फंसें।
जानकारी के अनुसार, पीड़ित अधिकारी को पहले एक फोन कॉल आया, जिसमें खुद को जांच एजेंसी का अधिकारी बताया गया। कॉलर ने दावा किया कि उनके नाम पर मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ा मामला दर्ज है और तुरंत जांच में सहयोग नहीं करने पर गिरफ्तारी हो सकती है। इसके बाद उन्हें लगातार 48 घंटे तक फोन और वीडियो कॉल के जरिए ‘निगरानी’ में रखा गया।
ठगों ने वीडियो कॉल पर एक फर्जी कोर्ट रूम जैसा दृश्य दिखाया, जहां जज की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति और अन्य कथित अधिकारी नजर आ रहे थे। इससे बुजुर्ग अधिकारी घबरा गए और उन्हें यकीन हो गया कि मामला गंभीर है। ठगों ने कहा कि जांच पूरी होने तक उन्हें किसी से संपर्क नहीं करना है और बैंक खाते की जानकारी साझा करनी होगी।
डर और दबाव में आकर अधिकारी ने अपनी पत्नी को बैंक भेजा, जहां एफडी तुड़वाकर रकम ट्रांसफर की गई। कुल मिलाकर 42.50 लाख रुपये अलग-अलग खातों में भेज दिए गए। हालांकि बैंक कर्मचारियों को लेन-देन संदिग्ध लगा और उन्होंने सतर्कता बरतते हुए आगे की बड़ी राशि ट्रांसफर होने से रोक दी।
इस मामले में अधिकारी के 53 वर्षीय बेटे ने अहमदाबाद साइबर क्राइम ब्रांच में शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। प्रारंभिक जांच में पता चला है कि कॉल अंतरराज्यीय गिरोह द्वारा की गई थी और रकम कई खातों में घुमाई गई।
साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे नए तरीके से ठग लोगों को मानसिक दबाव में डालते हैं। वे सरकारी एजेंसियों जैसे सीबीआई या पुलिस का नाम लेकर डर पैदा करते हैं और तुरंत कार्रवाई का भय दिखाते हैं।
पुलिस ने नागरिकों से अपील की है कि किसी भी अनजान कॉल पर बैंक विवरण साझा न करें और जांच एजेंसियों के नाम पर धमकी मिलने पर तुरंत स्थानीय पुलिस या साइबर हेल्पलाइन 1930 पर संपर्क करें।
यह घटना बताती है कि तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के साथ सतर्कता भी उतनी ही जरूरी है। खासकर वरिष्ठ नागरिकों को जागरूक करना समय की मांग बन गया है, ताकि वे ऐसे जालसाजों के चंगुल में न फंसें।