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अखाड़ा परिषद का तीखा बयान
रवींद्र पुरी ने अविमुक्तेश्वरानंद पर कड़ा हमला बोला
शंकराचार्य विवाद पर अखाड़ा परिषद का पलटवार योगी के समर्थन में उतरे संत
20 Feb 2026, 10:41 AM Uttar Pradesh - Sambhal
Reporter : Mahesh Sharma
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Sambhal उत्तर प्रदेश के संभल में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम के दौरान संत समाज के भीतर मतभेद खुलकर सामने आ गए। Akhil Bharatiya Akhara Parishad के राष्ट्रीय अध्यक्ष Ravindra Puri ने Avimukteshwaranand Saraswati के हालिया बयानों पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि संत समाज किसी प्रकार की ‘दादागिरी’ स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि परिषद मुख्यमंत्री Yogi Adityanath के साथ खड़ी है।

संभल में कल्कि महोत्सव के स्थापना दिवस समारोह के दौरान यह विवाद सामने आया। दरअसल, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने हाल में एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर ‘असली या नकली हिंदू’ जैसी टिप्पणी की थी, जिसे लेकर अखाड़ा परिषद ने कड़ी आपत्ति जताई। रवींद्र पुरी ने कहा कि किसी भी धार्मिक पद पर बैठे व्यक्ति को मर्यादा का पालन करना चाहिए और सार्वजनिक मंच से ऐसी भाषा का प्रयोग उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं एक संन्यासी परंपरा से आते हैं और धर्म तथा संस्कृति के संरक्षण के लिए कार्य कर रहे हैं। ऐसे में उनके प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग संत समाज को स्वीकार नहीं है। रवींद्र पुरी ने यह भी संकेत दिया कि धार्मिक विषयों को अनावश्यक रूप से राजनीतिक रंग देना ठीक नहीं है।

इस विवाद में कल्कि पीठाधीश्वर Acharya Pramod Krishnam ने भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि जितना अधिक विरोध या कूच किया जाएगा, उतना ही उसका उल्टा असर हो सकता है। उनके बयान ने विवाद को और चर्चा में ला दिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल धार्मिक मतभेद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक संकेत भी हैं। उत्तर प्रदेश में आगामी राजनीतिक गतिविधियों के मद्देनजर संत समाज के रुख को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

वहीं, शंकराचार्य समर्थकों का कहना है कि उनकी टिप्पणी को संदर्भ से हटाकर पेश किया गया है और उनका उद्देश्य किसी का अपमान करना नहीं था। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम ने संत समाज के भीतर वैचारिक मतभेद को उजागर कर दिया है।

फिलहाल, संभल में स्थिति शांतिपूर्ण बताई जा रही है, लेकिन बयानबाजी का दौर जारी है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में यह विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है और संत समाज के भीतर संवाद की क्या पहल होती है।