Search News
Tip: Search by heading, content, category, city, state, highlights.
- Select Location
- ताज़ा खबर
- राष्ट्रीय (भारत)
- अंतरराष्ट्रीय
- राज्य व क्षेत्रीय
- राजनीति
- सरकार व प्रशासन
- नीति व नियम
- न्यायालय व न्यायपालिका
- कानून व्यवस्था
- अपराध
- साइबर अपराध व डिजिटल सुरक्षा
- सुरक्षा व आतंकवाद
- अर्थव्यवस्था (मैक्रो)
- व्यापार व कॉरपोरेट
- बैंकिंग व भुगतान
- स्टार्टअप व उद्यमिता
- टेक्नोलॉजी
- विज्ञान व अनुसंधान
- पर्यावरण
- मौसम
- स्वास्थ्य
- शिक्षा
- नौकरी व करियर
- कृषि
- ग्रामीण विकास
- परिवहन
- दुर्घटना व सुरक्षा
- खेल
- मनोरंजन
- धर्म व अध्यात्म
- समाज व सामाजिक मुद्दे
- लाइफस्टाइल
- यात्रा व पर्यटन
- जन सेवा व अलर्ट
- जांच व विशेष रिपोर्ट
- प्रतियोगी परीक्षाएँ
- खेल (अन्य)
Choose Location
Current:
India
Country: India
Selected State: None
तनाव चरम पर पहुंचा
सीमित परमाणु संवर्धन प्रस्ताव पर अमेरिका गंभीरता से विचार
ईरान पर ट्रंप के दो रास्ते, समझौता या सख्त कार्रवाई का बढ़ा संकट
21 Feb 2026, 12:30 PM
Tehran -
Tehran
Reporter :
Mahesh Sharma
ADVERTISEMENT
Sponsored
Ad
Open
Tehran अरब सागर क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के रिश्ते एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर पहुंचते दिखाई दे रहे हैं। अमेरिकी प्रशासन के सामने ईरान को लेकर दो स्पष्ट विकल्प उभर कर सामने आए हैं—पहला, एक सीमित परमाणु समझौते के तहत नरमी दिखाना, और दूसरा, प्रतिबंधों व सख्त कार्रवाई के जरिए दबाव की नीति को और तेज करना।
सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की टीम इस समय एक ऐसे प्रस्ताव पर विचार कर रही है, जिसमें ईरान को बेहद सीमित या “टोकन” स्तर पर यूरेनियम संवर्धन की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि, इसके साथ कठोर अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण और तकनीकी निगरानी की शर्तें जोड़ी जाएंगी। अमेरिकी पक्ष की आधिकारिक नीति अब भी “जीरो एनरिचमेंट” की बताई जा रही है, लेकिन कूटनीतिक सूत्र संकेत दे रहे हैं कि राजनीतिक समाधान की गुंजाइश को पूरी तरह नकारा नहीं गया है।
वहीं दूसरी ओर, ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei की सरकार ने साफ कर दिया है कि देश अपनी परमाणु क्षमता को पूरी तरह त्यागने के लिए तैयार नहीं है। तेहरान का तर्क है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत अपने अधिकारों का उपयोग कर रहा है।
दोनों देशों के बीच अब तक परमाणु समझौते को लेकर दो दौर की वार्ता हो चुकी है। इन वार्ताओं में परमाणु संवर्धन की सीमा, आर्थिक प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। लेकिन अभी तक कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है। अमेरिकी प्रशासन के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि यदि ईरान तकनीकी रूप से भरोसेमंद और पारदर्शी गारंटी देता है, तो समझौते की संभावना बन सकती है।
इस बीच, संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी एजेंसी के प्रमुख Rafael Grossi भी तकनीकी उपायों पर चर्चा में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। संभावित प्रस्तावों में अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों की संख्या बढ़ाना, संवर्धन स्तर की सख्त सीमा तय करना और निगरानी तंत्र को डिजिटल रूप से मजबूत करना शामिल है।
हालांकि, कूटनीतिक हल के समानांतर सैन्य गतिविधियां भी तेज हो गई हैं। अरब सागर में अमेरिकी नौसैनिक उपस्थिति बढ़ने से क्षेत्र में अस्थिरता की आशंका गहरा गई है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि वार्ता विफल होती है, तो प्रतिबंधों के साथ-साथ कड़े आर्थिक और रणनीतिक कदम उठाए जा सकते हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह स्थिति केवल दो देशों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता से जुड़ा मुद्दा है। ऐसे में आने वाले सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। क्या अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीति जीत दर्ज करेगी या टकराव की राह चुनी जाएगी—इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।
सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की टीम इस समय एक ऐसे प्रस्ताव पर विचार कर रही है, जिसमें ईरान को बेहद सीमित या “टोकन” स्तर पर यूरेनियम संवर्धन की अनुमति दी जा सकती है। हालांकि, इसके साथ कठोर अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण और तकनीकी निगरानी की शर्तें जोड़ी जाएंगी। अमेरिकी पक्ष की आधिकारिक नीति अब भी “जीरो एनरिचमेंट” की बताई जा रही है, लेकिन कूटनीतिक सूत्र संकेत दे रहे हैं कि राजनीतिक समाधान की गुंजाइश को पूरी तरह नकारा नहीं गया है।
वहीं दूसरी ओर, ईरान के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei की सरकार ने साफ कर दिया है कि देश अपनी परमाणु क्षमता को पूरी तरह त्यागने के लिए तैयार नहीं है। तेहरान का तर्क है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और वह अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत अपने अधिकारों का उपयोग कर रहा है।
दोनों देशों के बीच अब तक परमाणु समझौते को लेकर दो दौर की वार्ता हो चुकी है। इन वार्ताओं में परमाणु संवर्धन की सीमा, आर्थिक प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। लेकिन अभी तक कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है। अमेरिकी प्रशासन के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि यदि ईरान तकनीकी रूप से भरोसेमंद और पारदर्शी गारंटी देता है, तो समझौते की संभावना बन सकती है।
इस बीच, संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी एजेंसी के प्रमुख Rafael Grossi भी तकनीकी उपायों पर चर्चा में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। संभावित प्रस्तावों में अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों की संख्या बढ़ाना, संवर्धन स्तर की सख्त सीमा तय करना और निगरानी तंत्र को डिजिटल रूप से मजबूत करना शामिल है।
हालांकि, कूटनीतिक हल के समानांतर सैन्य गतिविधियां भी तेज हो गई हैं। अरब सागर में अमेरिकी नौसैनिक उपस्थिति बढ़ने से क्षेत्र में अस्थिरता की आशंका गहरा गई है। विश्लेषकों का कहना है कि यदि वार्ता विफल होती है, तो प्रतिबंधों के साथ-साथ कड़े आर्थिक और रणनीतिक कदम उठाए जा सकते हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह स्थिति केवल दो देशों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता से जुड़ा मुद्दा है। ऐसे में आने वाले सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। क्या अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीति जीत दर्ज करेगी या टकराव की राह चुनी जाएगी—इस पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।