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सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मामले की सुनवाई
केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रहे विवाद की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में शुरू हो गई है। यह मामला सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस सुनवाई का असर आने वाले दशकों तक मंदिरों में धार्मिक प्रथाओं और महिलाओं के अधिकारों पर पड़ सकता है। मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान सभी पक्षों से अपनी लिखित दलीलें पूरी करने के निर्देश दिए। इस बहुचर्चित मामले में हिंदू धर्म की परंपराओं और व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता पर बहस का केंद्र बना है।
महिलाओं के प्रवेश पर परंपरागत प्रतिबंध
सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर वर्षों से प्रतिबंध रहा है। यह नियम भगवान अयप्पा के ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ स्वरूप के अनुसार रखा गया है। वर्षों से यह विवादित विषय रहा है और विभिन्न याचिकाओं के माध्यम से इसे चुनौती दी गई है। कोर्ट ने अब इस मामले में निर्णय प्रक्रिया को तेज करने का निर्देश दिया। महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध की धार्मिक और सामाजिक महत्ता को सुनवाई में प्रमुखता से रखा गया है।
तीन दिन में दलीलें पूरी करने का आदेश
सुनवाई की शुरुआत में मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सभी पक्षों को अपनी लिखित दलीलें पूरी करनी होंगी। कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि बहस में सभी पहलुओं पर विचार किया जाए। इस आदेश से स्पष्ट हो गया कि मामले में जल्द निर्णय लिया जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि मामले में सिर्फ कानूनी दृष्टिकोण नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक दृष्टि भी महत्वपूर्ण है। कोर्ट की यह प्रक्रिया महिला भक्ताओं और धार्मिक संस्थानों दोनों के हित को ध्यान में रखेगी।
हिंदू धर्म की बहुलता पर जोर
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपनी दलीलों में हिंदू धर्म की बहुलता को प्रमुखता से रखा। उन्होंने बताया कि हिंदू धर्म में विभिन्न परंपराओं और संप्रदायों की स्वतंत्रता है। उन्होंने गुरु आधारित और समावेशी धार्मिक स्थलों के उदाहरण दिए। शिरडी के मंदिर का उल्लेख करते हुए कहा कि यह किसी एक संप्रदाय तक सीमित नहीं है और यहां सभी भक्तों को समान अधिकार प्राप्त हैं। एसजी ने यह भी कहा कि सबरीमाला मामले में धार्मिक प्रथाओं और कानून के संतुलन पर विचार होना चाहिए।
अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, जस्टिस एस बागची और जस्टिस एमएम सुंदरेश ने अनुच्छेद 25 और 26 की व्याख्या पर सवाल उठाए। इन अनुच्छेदों में धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थानों का अधिकार तय है। कोर्ट ने यह देखा कि धार्मिक प्रथा और संविधान की स्वतंत्रता के बीच संतुलन जरूरी है। न्यायाधीशों ने कहा कि मामलों में समानता और धार्मिक स्वतंत्रता का सही विश्लेषण करना आवश्यक है।
सुनवाई का सामाजिक और धार्मिक महत्व
सबरीमाला मामले की सुनवाई का प्रभाव सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि समाज और धर्म पर भी पड़ेगा। यह निर्णय देश के मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश के अधिकारों और धार्मिक प्रथाओं को तय करेगा। विशेषज्ञों के अनुसार, यह सुनवाई धार्मिक प्रथाओं में सुधार और महिलाओं के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने का अवसर है। कोर्ट का निर्णय आने वाले वर्षों में मंदिरों की परंपराओं और महिलाओं के धार्मिक अधिकारों पर स्थायी प्रभाव डालेगा।
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