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भव्य कैंपस, लेकिन सन्नाटा पसरा हुआ
ग्रेटर नोएडा में स्थित Pandit Deendayal Upadhyaya Institute of Archaeology अपने विशाल और आधुनिक कैंपस के लिए जाना जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करती है। करीब 25 एकड़ में फैले इस संस्थान पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन यहां पहुंचने पर वीरानी का माहौल नजर आता है।
कैंपस में न छात्रों की हलचल दिखती है और न ही अकादमिक गतिविधियों की रौनक। चारों ओर फैली खामोशी यह सोचने पर मजबूर करती है कि इतने बड़े निवेश के बावजूद इसका उपयोग अपेक्षा के अनुरूप क्यों नहीं हो पा रहा है। यह स्थिति न केवल संसाधनों के उपयोग पर सवाल उठाती है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर भी चर्चा को जन्म देती है।
छात्रों की संख्या बेहद सीमित
इस संस्थान की सबसे चौंकाने वाली बात यहां पढ़ने वाले छात्रों की संख्या है। पूरे देश से केवल 15 छात्रों का ही प्रवेश तय किया गया है, जो इस विशाल परिसर के मुकाबले बेहद कम है।
इतनी बड़ी इमारत और सुविधाओं के बावजूद इतनी कम संख्या यह दर्शाती है कि संस्थान की योजना और वास्तविक उपयोग के बीच बड़ा अंतर है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या इस तरह के संस्थानों को अधिक छात्रों के लिए खोलने की जरूरत है, ताकि इसका सही इस्तेमाल हो सके।
फैकल्टी और स्टाफ की कमी पर सवाल
कैंपस में घूमने के दौरान सबसे बड़ी कमी फैकल्टी और स्टाफ की नजर आती है। कई विभाग और कार्यालय मौजूद होने के बावजूद वहां सक्रियता बहुत कम दिखाई देती है।
जानकारों के अनुसार, यहां पढ़ाई का मॉडल पारंपरिक संस्थानों से अलग है, जिसमें फील्डवर्क और प्रैक्टिकल ट्रेनिंग पर ज्यादा जोर दिया जाता है। हालांकि, इसके बावजूद स्थायी फैकल्टी की कमी एक बड़ा मुद्दा बनती जा रही है, जो छात्रों की पढ़ाई को प्रभावित कर सकती है।
सुविधाएं मौजूद, लेकिन उपयोग सीमित
संस्थान में अत्याधुनिक सुविधाएं और इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद हैं। इमारत का डिजाइन, प्रयोगशालाएं और अन्य संसाधन इसे एक उन्नत संस्थान बनाते हैं।
लेकिन इन सुविधाओं का उपयोग सीमित नजर आता है। कई कमरे बंद पड़े हैं और गलियारों में सन्नाटा पसरा रहता है। इससे यह साफ होता है कि उपलब्ध संसाधनों का पूरा लाभ नहीं उठाया जा रहा है, जो एक गंभीर चिंता का विषय है।
पढ़ाई का अनोखा मॉडल, लेकिन सवाल कायम
संस्थान में पढ़ाई का तरीका पारंपरिक नहीं है। यहां फिक्स सिलेबस के बजाय प्रैक्टिकल एक्सपोजर और फील्डवर्क पर आधारित शिक्षा दी जाती है।
हालांकि, यह मॉडल अपने आप में अनोखा है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं। छात्रों की कम संख्या और नियमित अकादमिक गतिविधियों की कमी इस मॉडल को लेकर संशय पैदा करती है। ऐसे में इसे और बेहतर बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है।
बड़े निवेश पर उठ रहे जवाबदेही के सवाल
इतने बड़े निवेश के बावजूद संस्थान की मौजूदा स्थिति ने जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार और संबंधित एजेंसियों के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे इस स्थिति का मूल्यांकन करें।
यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो यह संस्थान अपनी संभावनाओं के बावजूद पीछे रह सकता है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि इस दिशा में क्या कदम उठाए जाते हैं और कैसे इस संस्थान को एक सक्रिय और प्रभावी शिक्षा केंद्र बनाया जाता है।
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