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होर्मुज हमले में देवरिया का लाल
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाज पर हमले ने उजाड़ा परिवार, देवरिया के शिवानंद की मौत से गांव शोकाकुल
12 Jun 2026, 11:34 AM Uttar Pradesh - Deoria
Reporter : Mahesh Sharma
Deoria

विदेशी कमाई का सपना टूटा

रोजगार की तलाश में विदेश गए उत्तर प्रदेश के देवरिया निवासी शिवानंद चौरसिया की मौत ने एक पूरे परिवार की दुनिया उजाड़ दी। ओमान के पास स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्षेत्र में जहाज पर हुए हमले में उनकी जान चली गई। इस खबर के गांव पहुंचते ही खुशहाल दिखने वाला घर मातम में बदल गया। जिस बेटे के सहारे बुजुर्ग माता-पिता अपने भविष्य की उम्मीदें देख रहे थे, वही अब कभी वापस नहीं लौटेगा। परिवार के लिए यह सिर्फ एक मौत नहीं, बल्कि उन तमाम सपनों का अंत है जिन्हें बेहतर जिंदगी की उम्मीद के साथ बुना गया था। गांव के लोग बताते हैं कि शिवानंद मेहनती और जिम्मेदार स्वभाव के थे। विदेश जाकर परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारना उनका सबसे बड़ा उद्देश्य था। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। अब उनके घर में बच्चों की सिसकियां, पत्नी की सूनी मांग और माता-पिता की टूटती उम्मीदें ही बची हैं। यह घटना उन हजारों परिवारों की पीड़ा को भी सामने लाती है, जो अपने प्रियजनों को बेहतर भविष्य की तलाश में दूर देशों में भेजते हैं।

कर्ज लेकर बेटे को भेजा था

शिवानंद के पिता रामजी चौरसिया पेशे से किसान हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने अपने बेटे को विदेश भेजने का कठिन फैसला किया था। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, इसलिए उन्होंने कर्ज लेकर बेटे के सपनों को उड़ान दी। उन्हें उम्मीद थी कि बेटा विदेश में मेहनत करेगा और धीरे-धीरे परिवार की परिस्थितियां बदल जाएंगी। खेतों की आमदनी से मुश्किल से घर का खर्च चलाने वाले इस परिवार ने बेहतर भविष्य के लिए हर संभव त्याग किया। पिता ने कभी नहीं सोचा था कि जिस बेटे को अपने हाथों से विदा किया, उसकी मौत की खबर सुननी पड़ेगी। अब कर्ज चुकाने की चिंता के साथ बेटे को खोने का दर्द भी उन्हें भीतर तक तोड़ रहा है। गांव के लोगों के अनुसार, रामजी अक्सर बेटे की सफलता की बातें किया करते थे और उसके लौटने का इंतजार करते थे। आज वही पिता अपने बेटे का पार्थिव शरीर अंतिम बार देखने की आस लगाए बैठे हैं। उनका एक ही आग्रह है कि किसी तरह बेटे को आखिरी बार घर वापस लाया जाए।

आखिरी बातचीत बनी यादों का सहारा

परिजनों के अनुसार, शिवानंद की अपने पिता से आखिरी बार कुछ दिन पहले बातचीत हुई थी। उन्होंने बताया था कि वे ओमान के पास हैं और सब कुछ सामान्य है। परिवार ने भी राहत की सांस ली थी कि बेटा सुरक्षित है और अपने काम में व्यस्त है। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि यही बातचीत अंतिम साबित होगी। मौत की खबर मिलने के बाद परिवार बार-बार उसी आखिरी बातचीत को याद कर रहा है। पिता को बेटे की आवाज कानों में गूंजती महसूस होती है, जबकि पत्नी उस बातचीत के हर शब्द को अपनी आखिरी निशानी मानकर रो पड़ती है। बच्चों को अभी पूरी तरह समझ भी नहीं है कि उनके पिता अब कभी लौटकर नहीं आएंगे। परिवार के लिए यह स्वीकार करना बेहद कठिन है कि कुछ दिन पहले तक जो व्यक्ति उनके भविष्य की योजनाएं बना रहा था, वह अब इस दुनिया में नहीं रहा। यही कारण है कि घर का हर सदस्य सदमे और अविश्वास की स्थिति में है।

पत्नी और मासूम बच्चों का दर्द

शिवानंद की मौत के बाद सबसे अधिक दर्द उनकी पत्नी और छोटे बच्चों की आंखों में दिखाई देता है। परिवार की जिम्मेदारियां उठाने वाले व्यक्ति के अचानक चले जाने से उनके सामने जीवन की बड़ी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। पत्नी का रो-रोकर बुरा हाल है। वह बार-बार यही सवाल कर रही है कि अब बच्चों का भविष्य कौन संवार पाएगा। मासूम बच्चे अपने पिता के लौटने का इंतजार कर रहे हैं और घर का माहौल समझने की कोशिश कर रहे हैं। रिश्तेदार और पड़ोसी उन्हें ढांढस बंधाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन इस दुख की भरपाई संभव नहीं दिखती। परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर थी और अब कमाने वाले सदस्य की मौत ने हालात को और कठिन बना दिया है। ऐसे में सरकारी सहायता और सामाजिक सहयोग की आवश्यकता भी महसूस की जा रही है। गांव के लोग मानते हैं कि इस परिवार को हरसंभव मदद मिलनी चाहिए ताकि बच्चों की शिक्षा और भविष्य सुरक्षित रह सके।

गांव में पसरा गहरा मातम

शिवानंद की मौत की खबर फैलते ही पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई। पड़ोसी और परिचित परिवार के घर पहुंचकर संवेदनाएं व्यक्त कर रहे हैं। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि शिवानंद मिलनसार और मेहनती स्वभाव के युवक थे। उन्होंने हमेशा अपने परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाई। लोगों को विश्वास नहीं हो रहा कि गांव का एक होनहार बेटा इस तरह दुनिया छोड़ गया। कई लोगों ने प्रशासन और सरकार से परिवार की हरसंभव सहायता करने की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि विदेशों में काम करने वाले श्रमिकों की सुरक्षा और संकट की स्थिति में उनके परिवारों को तत्काल मदद देने की व्यवस्था और मजबूत होनी चाहिए। इस घटना ने पूरे गांव को झकझोर दिया है और हर व्यक्ति परिवार के दुख को अपना दुख मान रहा है।

पार्थिव शरीर लाने की मांग

परिवार की सबसे बड़ी इच्छा अब शिवानंद का पार्थिव शरीर भारत लाने की है ताकि पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जा सके। परिजनों ने सरकार और संबंधित अधिकारियों से मदद की अपील की है। उनका कहना है कि अंतिम दर्शन के बिना इस दुख को स्वीकार करना और भी कठिन हो जाएगा। गांव के लोगों ने भी प्रशासन से इस दिशा में त्वरित प्रयास करने की मांग की है। विदेशों में काम करने वाले भारतीयों के सामने आने वाले जोखिमों ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। बेहतर भविष्य की तलाश में घर से दूर जाने वाले लाखों भारतीयों के परिवार इस घटना के बाद भावुक और चिंतित हैं। फिलहाल देवरिया का यह परिवार केवल एक उम्मीद के सहारे बैठा है—कि उनका बेटा, पति और पिता आखिरी बार अपने घर की चौखट तक जरूर लौटे, ताकि उसे नम आंखों के साथ अंतिम विदाई दी जा सके।

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