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विरासत से मिली राजनीति, बदला नाम और पहचान
बिहार की राजनीति में उभरते चेहरे सम्राट चौधरी की कहानी पारंपरिक राजनीतिक रास्तों से अलग नजर आती है। उनका असली नाम राकेश कुमार था, जिसे बदलकर उन्होंने सम्राट चौधरी कर लिया। उनके पिता शकुनी चौधरी खुद एक स्थापित नेता रहे, जिससे उन्हें सियासत विरासत में मिली। लेकिन इस विरासत के बावजूद सम्राट ने अपने दम पर पहचान बनाई। शुरुआत में उन्होंने किसी बड़ी विचारधारा या संगठन के सहारे राजनीति नहीं की, बल्कि अपनी जमीन खुद तैयार की। यही कारण है कि उनका सफर आम नेताओं से अलग और ज्यादा संघर्षपूर्ण माना जाता है। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी पहचान मजबूत की और राजनीतिक समझ विकसित करते हुए सत्ता के करीब पहुंचने का रास्ता बनाया।
शुरुआती करियर में मंत्री बने, विवादों से घिरे
सम्राट चौधरी का शुरुआती राजनीतिक करियर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा। वह कम उम्र में ही राबड़ी देवी की सरकार में मंत्री बने, जिससे वह सुर्खियों में आए। हालांकि, यह उपलब्धि विवादों से घिर गई जब उनकी उम्र को लेकर सवाल उठे। विपक्ष ने आरोप लगाया कि वह मंत्री बनने की न्यूनतम आयु पूरी नहीं करते। इस विवाद के चलते उन्हें पद से इस्तीफा भी देना पड़ा। लेकिन इस घटना ने उनके राजनीतिक सफर को रोका नहीं, बल्कि उन्हें और मजबूत बनाया। उन्होंने इसे एक सीख के तौर पर लिया और आगे बढ़ते हुए अपनी रणनीति को बेहतर किया। यही वजह है कि आज उन्हें एक जुझारू और संघर्षशील नेता के रूप में देखा जाता है।
गैर-BJP पृष्ठभूमि से BJP तक का सफर
सम्राट चौधरी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि उनका शुरुआती राजनीतिक जुड़ाव राष्ट्रीय जनता दल और अन्य दलों से रहा, न कि सीधे भारतीय जनता पार्टी से। बाद में उन्होंने बीजेपी का दामन थामा और यहीं से उनके करियर ने नई दिशा पकड़ी। खास बात यह रही कि उनका कोई संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी नहीं रहा, जो आमतौर पर बीजेपी नेताओं के लिए एक मजबूत आधार माना जाता है। इसके बावजूद उन्होंने पार्टी में अपनी जगह बनाई और तेजी से ऊपर उठे। यह उनके राजनीतिक कौशल और नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है, जिसने उन्हें पार्टी के भीतर अलग पहचान दिलाई।
2014 के बाद बदली सियासत, मिला बड़ा मंच
देश की राजनीति में 2014 के बाद आए बदलावों का असर सम्राट चौधरी के करियर पर भी पड़ा। बीजेपी के विस्तार और संगठनात्मक मजबूती के दौर में उन्हें बड़े अवसर मिले। इस दौरान उत्तर प्रदेश में केशव प्रसाद मौर्य के उभार ने भी उन्हें प्रेरित किया। उन्होंने अपने सियासी अंदाज को बदला और आक्रामक राजनीति की राह अपनाई। धीरे-धीरे वह पार्टी के भरोसेमंद नेताओं में शामिल हो गए। संगठन में उनकी सक्रियता और रणनीतिक सोच ने उन्हें बिहार की राजनीति में मजबूत स्तंभ बना दिया। यही वह दौर था जब उन्होंने खुद को एक बड़े नेता के रूप में स्थापित करना शुरू किया।
नीतीश के खिलाफ मुरेठा कसम से पहचान
2022 में जब नीतीश कुमार ने बीजेपी से अलग होकर नई सरकार बनाई, तब सम्राट चौधरी ने खुलकर विरोध किया। उन्होंने मुरेठा बांधकर कसम खाई कि जब तक नीतीश कुमार सत्ता से बाहर नहीं होंगे, वह इसे नहीं उतारेंगे। यह कदम उनके राजनीतिक करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। इससे उनकी छवि एक मजबूत और आक्रामक नेता के रूप में बनी। जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। यह प्रतीकात्मक विरोध उनके लिए पहचान का बड़ा जरिया बन गया और उन्हें राज्य स्तर पर बड़ा नेता बना दिया।
आठ साल में शिखर तक पहुंचने की कहानी
सिर्फ आठ वर्षों में सम्राट चौधरी ने जिस तरह से राजनीतिक सीढ़ियां चढ़ीं, वह अपने आप में एक मिसाल है। बिना RSS बैकग्राउंड और बिना बीजेपी से शुरुआत के बावजूद उन्होंने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में जगह बनाई। आज वह बिहार में बीजेपी के सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते हैं। उनका मुख्यमंत्री बनना न सिर्फ उनकी व्यक्तिगत सफलता है, बल्कि पार्टी के लिए भी ऐतिहासिक क्षण माना जा रहा है। यह सफर दिखाता है कि राजनीति में केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि रणनीति, मेहनत और सही समय पर लिए गए फैसले भी सफलता तय करते हैं।
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