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ईद के बहाने सियासी समीकरण साधने की कोशिश
उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति तेज कर दी है। खासकर मुस्लिम वोटरों को साधने के लिए बीजेपी और समाजवादी पार्टी दोनों ने ईद के मौके पर बड़े आयोजन किए। लखनऊ में आयोजित ईद मिलन कार्यक्रमों के जरिए दोनों दलों ने अलग-अलग तरीके से अपने संदेश देने की कोशिश की। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि करीब 20 फीसदी मुस्लिम मतदाता राज्य की कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं, ऐसे में उनका समर्थन हासिल करना किसी भी दल के लिए बेहद अहम हो जाता है।
Akhilesh Yadav की रणनीति और संदेश
समाजवादी पार्टी प्रमुख Akhilesh Yadav ने ईद और होली मिलन कार्यक्रम के जरिए सामाजिक सौहार्द और एकता का संदेश देने की कोशिश की। उन्होंने सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा कर बीजेपी पर अप्रत्यक्ष हमला भी बोला। सपा का फोकस अपने पारंपरिक मुस्लिम-यादव समीकरण को मजबूत करने पर नजर आया। हालांकि पार्टी के कार्यक्रम में उतनी बड़ी राजनीतिक मौजूदगी नहीं दिखी, जितनी बीजेपी के आयोजन में देखने को मिली। इससे सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि सपा का यह प्रयास अपेक्षा के अनुरूप प्रभाव नहीं छोड़ पाया।
Yogi Adityanath सरकार का नया प्रयोग
वहीं दूसरी ओर Yogi Adityanath की सरकार में अल्पसंख्यक मंत्री दानिश आजाद अंसारी द्वारा आयोजित ‘ईद स्नेह मिलन’ कार्यक्रम ने खासा ध्यान खींचा। इस आयोजन में सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री और नेता शामिल हुए। यह पहली बार माना जा रहा है जब बीजेपी ने इतने बड़े स्तर पर मुस्लिम समुदाय के बीच इस तरह का कार्यक्रम किया। इसके जरिए पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वह अब मुस्लिम समाज के साथ संवाद बढ़ाने के लिए तैयार है।
बीजेपी के आयोजन में दिखी बड़ी भागीदारी
बीजेपी के ईद मिलन कार्यक्रम में बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग और उलेमा शामिल हुए। कार्यक्रम में राज्य सरकार के कई मंत्री और संगठन के पदाधिकारी भी मौजूद रहे। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बीजेपी का यह कदम 2027 चुनाव को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है, जिसमें पार्टी अपने वोट बैंक का विस्तार करना चाहती है। इस आयोजन में संवाद और संपर्क बढ़ाने पर खास जोर दिया गया, जिससे मुस्लिम समाज में पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ सके।
मुस्लिम वोटरों पर बढ़ती सियासी नजर
उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम वोटर हमेशा से अहम भूमिका निभाते रहे हैं। लगभग 20 प्रतिशत की आबादी होने के कारण वे कई सीटों पर जीत-हार का समीकरण तय करते हैं। यही वजह है कि बीजेपी और सपा दोनों ही इस वर्ग को अपने पक्ष में करने के लिए अलग-अलग रणनीतियां अपना रहे हैं। जहां सपा अपने पारंपरिक समर्थन को बनाए रखने की कोशिश में है, वहीं बीजेपी नए समीकरण बनाने में जुटी हुई है।
चुनाव से पहले सियासी मिठास का असर
अब सवाल यह है कि ईद मिलन और ऐसे आयोजनों से पैदा हुई यह ‘सियासी मिठास’ किस दल के लिए ज्यादा फायदेमंद साबित होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ आयोजन करने से नहीं, बल्कि लगातार संवाद और भरोसे से ही वोटरों का रुख बदला जा सकता है। आने वाले समय में यह साफ होगा कि बीजेपी का नया प्रयोग सफल होता है या सपा अपनी पारंपरिक पकड़ बनाए रखने में कामयाब रहती है। फिलहाल, यूपी की राजनीति में यह मुकाबला और दिलचस्प होता नजर आ रहा है।
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