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स्कूल में बेटियों की एंट्री पर सवाल
उत्तर प्रदेश के Basti जिले से सामने आया एक मामला शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। यहां एक सरकारी इंटर कॉलेज में पिछले कई दशकों से लड़कियों के प्रवेश पर रोक जैसी स्थिति बनी हुई है।
यह मामला तब चर्चा में आया जब एक पिता अपनी बेटी का दाखिला कराने के लिए स्कूल पहुंचे, लेकिन उन्हें प्रवेश नहीं दिया गया। इस घटना ने स्थानीय प्रशासन और शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पिता का अनोखा विरोध बना चर्चा का विषय
दाखिले से इनकार किए जाने के बाद पिता ने विरोध का एक अनोखा तरीका अपनाया। वे टॉयलेट सीट लेकर स्कूल पहुंचे और इसे वहां की बुनियादी सुविधाओं की कमी का प्रतीक बताया।
उनका कहना था कि जब तक स्कूल में लड़कियों के लिए शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं होंगी, तब तक बेटियों की पढ़ाई केवल कागजों में ही सीमित रहेगी।
यह विरोध स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया और लोगों का ध्यान इस समस्या की ओर गया।
रिकॉर्ड में को-एड, हकीकत में अलग तस्वीर
हैरानी की बात यह है कि सरकारी रिकॉर्ड में यह स्कूल को-एड यानी सहशिक्षा संस्थान के रूप में दर्ज है। बावजूद इसके, यहां एक भी लड़की का दाखिला नहीं होना कई सवाल खड़े करता है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि वर्षों से यह स्थिति बनी हुई है और जिम्मेदार अधिकारी इस पर ध्यान नहीं दे रहे हैं।
यह विरोधाभास बताता है कि जमीनी स्तर पर नीतियों और उनकी क्रियान्विति के बीच बड़ा अंतर है।
निजी स्कूलों की ओर मोड़ा जा रहा रुख
इस मामले में एक और गंभीर आरोप यह है कि सरकारी स्कूल में लड़कियों को प्रवेश न देकर उन्हें निजी स्कूलों की ओर धकेला जा रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पास में ही निजी संस्थान हैं, जहां दाखिले के लिए मोटी फीस ली जाती है। इससे गरीब परिवारों के लिए अपनी बेटियों को पढ़ाना और भी मुश्किल हो जाता है।
यह स्थिति शिक्षा में असमानता को और बढ़ा रही है।
बुनियादी सुविधाओं की कमी बना कारण
स्कूल प्रशासन का कहना है कि सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण लड़कियों को प्रवेश नहीं दिया जा रहा है।
बताया जा रहा है कि स्कूल में न तो अलग शौचालय है और न ही पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था। ऐसे में प्रबंधन खुद को असहज स्थिति में मानता है।
हालांकि, सवाल यह उठता है कि इतने वर्षों में इन समस्याओं का समाधान क्यों नहीं किया गया।
प्रशासन से कार्रवाई की बढ़ी मांग
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद अब प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग उठने लगी है। लोग चाहते हैं कि स्कूल में तुरंत जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं और लड़कियों को पढ़ने का अधिकार मिले।
विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षा का अधिकार सभी के लिए समान होना चाहिए और किसी भी प्रकार का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है।
यह घटना एक बार फिर यह दिखाती है कि योजनाओं के बावजूद जमीनी स्तर पर अभी भी कई चुनौतियां मौजूद हैं, जिन्हें दूर करना बेहद जरूरी है।
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